Saturday, 30 March 2019

गुरूकुल शिक्षा पद्धति


            प्रश्नोत्तरी ( गुरूकुल शिक्षा पद्धति ) 

प्रश्न :- गुरूकुल शिक्षा प्रणाली क्या होती है ?
उत्तर :- घर में न रहकर गुरू के अधीन रहते हुए ब्रह्मचर्य पूर्वक त्याग, तपस्या युक्त जीवन यापन करते हुए विद्या अर्जन करना गुरूकुल शिक्षा प्रणाली है ।

प्रश्न :- ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी किसे कहते हैं ?
उत्तर :- जो आचार्य कुल में रहकर शरीर की रक्षा, चित की रक्षा करते हुए विद्या के लिये प्रयत्न करे उसे ब्रह्मचारी या ब्रह्मचारिणी कहते हैं ।

प्रश्न :- गुरूकुल में कितनी आयु के बच्चों का प्रवेश होता है ?
उत्तर :- गुरूकुल में 6 वर्ष की आयु में प्रवेश होता है । या अपवाद रूप में किसी गुरूकुल में बड़ी आयु में भी प्रवेश होता ही है ।

प्रश्न :- गुरूकुल में प्रवेश पाने वाले बच्चों की पारिवारिक अवस्था कैसी होनी चाहिये ?
उत्तर :- गुरूकुल में अमीर, गरीब, राजा, दरिद्र, आदिवासी, अछूत सबका समान रूप से प्रवेश हो सकता है, कोई भेद भाव नहीं है ।


प्रश्न :- गुरूकुलीय विद्यार्थी के भोजन, वस्त्र कैसे होते हैं ?
उत्तर :- गुरूकुलीय विद्यार्थीयों का भोजन शुद्ध, सात्विक तथा वस्त्र सभ्य शिष्ट आदर्श होते हैं ।

प्रश्न :- प्राचीन गुरूकुलों में कौन कौन से विषय पढ़ाये जाते थे ?
उत्तर :- प्राचीन गुरूकुलों में वेद, दर्शन, उपनिषद, व्याकरण आदि आर्ष ग्रन्थ पढ़ाये जाने के साथ साथ गणित, भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, चिकित्सा, भूगोल, खगोल, अन्तरिक्ष , गृह निर्माण, शिल्प, कला, संगीत, तकनीकी, राजनीती, अर्थशास्त्र, न्याय, विमान विद्या, युद्ध, अयुद्ध निर्माण, योग, यज्ञ एवं कृषि इत्यादि जो मनुष्य के भौतिक तथा आध्यात्मिक उन्नति के लिये आवश्यक होते हैं वे सभी पढ़ाये जाते थे ।



प्रश्न :- गुरूकुल में पढ़ाई का समय क्या होता था ?
उत्तर :- गुरूकुल में पढ़ाई का समय सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त तक होता था ।




प्रश्न :- गुरूकुल की समय व्यवस्था कैसी थी ?
उत्तर :- सामान्यतः प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर विद्यार्थीगण उठते थे, शौच आदि क्रिया से निवृत होकर ऊषा पान ( तांबे के बर्तन का जल पीना ) करते थे । फिर व्यायाम, स्नान, संध्या, प्राणायाम, अग्निहोत्र ( यज्ञ ) आदि के बाद भोजन करते थे । और फिर विद्या का अध्ययन आरम्भ होता था । जिसमें महत्वपूर्ण विषय आते थे । कक्षाओं में न पढ़ाकर वृक्षों के नीचे या प्राकृतिक वातावरण में पढ़ाया जाता था । सूर्यास्त के समय संध्या अग्निहोत्र आदि से निवृत होकर विद्यार्थी रात्री का भोजन करके विश्राम करते थे । भोजन केवल दो बार ही मिलता था । क्योंकि मनुष्य को दीर्घायु के लिये दो समय ही भोजन करना उचित है ।

प्रश्न :- प्राचीन गुरूकुलों में शिक्षा का शुल्क क्या था ?
उत्तर :- प्राचीन काल में गुरूकुल शिक्षा निःशुल्क थी ।

प्रश्न :- गुरूकुलों का खर्च कैसे चलता था ?
उत्तर :- गुरुकुलों का खर्च ग्रामीणों के दान से और सरकार के द्वारा चला करता था ।

प्रश्न :- गुरूकुल कहाँ बनाये जाते थे ?
उत्तर :- गुरूकुल ग्रामों से दूर अरण्य ( वन ) में बसाये जाते थे ।

प्रश्न :- गुरूकुल केवल बालकों के ही होते थे या बालिकाओं के भी ?
उत्तर :- गुरूकुल बालकों और बालिकाओं के दोनो के हुआ करते थे । और दोनों के गुरूकुलों में दूरी कम से कम 12 कोस की हुआ करती थी ।

प्रश्न :- गुरूकुलों की शिक्षा का माध्यम क्या था ?
उत्तर :- गुरूकुलों की शिक्षा का माध्यम संस्कृत ही था और सदा संस्कृत ही रहेगा ।

प्रश्न :- भारत में गुरूकुल शिक्षा प्रणाली कितनी पुरानी है ?
उत्तर :- भारत में गुरूकुल शिक्षा प्रणाली आदिकाल से है । जब से मनुष्य की उत्पत्ति हुई है ।

प्रश्न :- प्राचीन काल में भारत में कितने गुरूकुल थे ?
उत्तर :- यह समूचे भरतखंड की सीमा त्रिविष्टिप ( तिब्बत ) से लेकर सींहल द्वीप ( श्रीलंका ) , ब्रह्मदेश ( म्यांमार ) से लेकर काम्बोज ( अफगानिस्तान ) तक थी । तो हर गाँव में कम से कम एक गुरूकुल था, किसी में तो तीन भी पाये जाते थे, हम औसतन 2 मान कर चलें तो, भारत में करीब 18 लाख के गाँव थे । तो कुल योग हुआ 18 x 2 = 36 लाख कम से कम गुरूकुल आर्यवर्त की सीमाओं में पाये जाते थे । तो पूर्व से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण में श्रीलंका तक करीब इतने वैदिक गुरूकुल थे जहाँ, बच्चे शिक्षा प्राप्त करते थे । इससे अधिक भी हो सकते हैं । परंतु इससे कम नहीं ।

प्रश्न :- कुछ प्रचीन विश्वविद्यालयों के नाम लिखें ।
उत्तर :- नालंदा विश्वविद्यालय , तक्षशिला विश्वविद्यालय, वल्लभीपुर आदि प्रसिद्ध हैं ।

प्रश्न :- आधुनिक काल में गुरूकुल की स्थापना कब, कहाँ हुई ? और किसने की ?
उत्तर :- आधुनिक काल में सर्व प्रथम हरिद्वार के कांगड़ी नामक गाँव में सन् 1902 में गुरूकुल की स्थापना स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती जी ने की थी ।

प्रश्न :- राष्ट्र की खोई गरिमा कैसे वापिस आयेगी ?
उत्तर :- राष्ट्र की खोई गरिमा गुरूकुल शिक्षा प्रणाली की पुनः स्थापना करने से आयेगी ।

प्रश्न :- गुरूकुल शिक्षा प्रणाली से शिक्षा प्राप्त किये महापुरुषों के नाम बतायें ?
उत्तर :- राम, कृष्ण, वशिष्ठ, कपिल, कणाद, भीष्म, गौतम, पतंजली, धनवंतरी, परशूराम, अर्जुन, भीम, द्रोण, याज्ञवलक्य, गार्गी, मैत्रेयी, द्रौपदी, अंजना आदि महान आत्मायें गुरूकुलों से ही हुईं हैं ।
आनन्ददायी गुरुकुल शिक्षणपद्धति भारत में लाने हेतु कटिबद्ध हो जाए !

गुरुकुल पद्धति ही आवश्यक 
‘पैसा देकर उत्तीर्ण होनेवाले विद्यार्थी शिक्षा के उपरान्त समाज के नागरिक बनते हैं और अपना व्यवसाय सच्चाई से नहीं करते । केवल अर्थार्जन का ही विचार प्रधानरूप से कर कार्य करते हैं । उसमें उन्हें आत्मीयता नहीं रहती, अपितु अपना स्वार्थ साधकर ‘हम हमारे परिवार के साथ कैसे ऐश्वर्य में, आराम में जी सकते हैं’, यही उनके जीवन का उद्देश्य होता है । कोई छात्र राजनीति में गया, तो वहां भी समाज कल्याण की उपेक्षा कर भ्रष्टाचारद्वारा संपत्ति इकट्ठा करता है । इसमें सामान्य जनता भी झुलस जाती है ।

इसीलिए पूर्वकाल में ऋषीमुनियों ने अपने आश्रम में विद्यार्थियों को सभी दृष्टि से सामर्थ्यवान करनेवाली शिक्षा प्रदान की । इसलिए १२ वर्षों के उपरान्त आश्रम से बाहर निकलनेपर वह आत्माविश्वास के साथ जीवन का सामना करता था । जीवन एक कला है । जीवन सर्वथा स्वयम्पूर्ण रीति से आनन्द, सामथ्र्य एवं स्वावलम्बित्व के साथ कैसे जीएं, यह उसे उस आश्रम में बताया जाता था, इतना ही नहीं; अपितु वैसा पाठ और प्रयोग उससे करा लिया जाता था ।’

गुरुकुल शिक्षणपद्धति ही वास्तविक अर्थ से प्रत्येक व्यक्ति का और देश का विकास करवाएगी
भारत में पूर्वकाल से चली आ रही गुरुकुलपद्धतिद्वारा विद्यादान किया जाता था । ब्रिटिश शासनकाल में भारतियों को आंग्लप्रेमी बनाने के उद्देश्य से लॉर्ड मेकॉले ने हेतुपूर्वक ऐसी ही निठल्ली शिक्षापद्धति उस समय आरम्भ की । स्वतन्त्रता के पश्चात भी वही शिक्षापद्धति आजतक जारी रखी है । आज की शिक्षाद्वारा काली चमडी के केवल बाबू लोग तैयार हो रहे हैं । स्नातक युवकों को उनके द्वारा प्राप्त किए ज्ञान का व्यवहार में केवल पांच प्रतिशत ही उपयोग होता है । इसलिए वे तुरन्त स्वतन्त्ररूप से व्यवसाय नहीं कर पाते हैं । इसके फलस्वरूप वे विफल हो जाते हैं और इसका देश के विकासपर भी अनिष्ट प्रभाव होता है । यदि गुरुकुलपद्धतिद्वारा प्रत्येक की गुणवत्तानुसार व्यवसायपर आधारित शिक्षा प्रारम्भ से दी जाएगी, तो युवक व्यवसाय उत्तम प्रकार से कर पाएंगे और देश का विकास भी योग्य प्रकार से होगा; इसलिए गुरुकुल शिक्षा पद्धति का नए से प्रारम्भ किया जाना चाहिए ।

पुनःश्च हरिॐ
‘पाश्चिमात्यों के प्रभाव का परिणाम देखते हुए पुनः गुरुकुल और ‘राष्ट्रीय पाठशालाएं’ स्थापित हो रही हैं । वे यदि पूर्वकाल की पद्धति आचरण में लाना आरम्भ करेंगे, तो विश्व में शान्ति प्रस्थापित कर, समाज को उन्नत बनाकर, सम्पूर्ण सृष्टि को उसका ऐश्वर्य प्राप्त करवाने का सामथ्र्य निर्माण करनेवाले खरे ज्ञानी तैयार होंगे, इसमें सन्देह नहीं ।’

विज्ञान चैतन्यरहित होने से वह विद्यार्थियों को काम निपटाने को सिखाता है । निपटा देने की यह वृत्ति कंटाला लाती है, अतः ऐसी पढाई से विद्यार्थियोंपर तनाव आता है । किन्तु अध्यात्म नित्यनूतन और चैतन्यमय होने से वह भक्तों को, श्रद्धालुओं को प्रतिदिन भिन्न प्रकार का आनन्द प्रदान करता है । वाचन में अधिकाधिक गहराई में जानेपर आनन्द द्विगुणित होता है और इससे हमें सन्तुष्टि मिलती है । इसीलिए ‘सन्त-चरित्र पढते समय उसका बहुत कंटाला आया है, ऐसा लग रहा है कि यह कब पढकर समाप्त होगा’ , ऐसे वाक्य किसी के भी मुख से बाहर निकलते हुए नहीं दिखाई देते । इसका कारण है, सन्त-चरित्र में विद्यमान चैतन्य और सन्तों की प्रत्यक्ष अनुभूतियुक्त वाणी ! पूर्वकाल में गुरुकुल में हिन्दू धर्मसम्बन्धी आचार और विचार पद्धतियों को, हिन्दू धर्मान्तर्गत शास्त्रशुद्ध प्रमाणों को आत्यन्तिक महत्त्व देकर देवताओं और ऋषियों की कृपा से अध्ययन और अध्यापन किया जाता था, जिससे वह वातावरण ही चैतन्य से आनन्दित हुआ होता था ।

तो फिर चले, पुनः एक बार ‘आनन्ददायी गुरुकुलरूपी धर्मशिक्षापद्धति’ भारत में लाने के लिए कटिबद्ध हो जाएंगे और न्यूनतम आगामी पीढियों को तो चैतन्य का तथा इससे मिलनेवाली ईश्वरीय कृपा का आनन्द देने के लिए सिद्ध हो जाएंगे !

ॐ 🌹🌷🚩🙏
Santoshkumar B Pandey at 9.46am

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